पलायन: एक छोटा -सा मेरा गांव पूरा बिग बाजार था…

खबर शेयर करें

छोटा- सा गांव मेरा,
पूरा बिग बाजार था।।
कुछ पंडित
बहुत से ठाकुर
कुछ शिल्पकार, तो एक लोहार था,
छोटे-छोटे घर थे,
पर हर आदमी बड़ा दिलदार था।
कहीं भी रोटी खा लेते,
हर घर में भोजन तैयार था।
आलू/मूली की थिंच्वाणी मजे से खाते थे,
जिसके आगे शाही पनीर बेकार था।
दो मिनट की मैग्गी न पिज्जा,
झटपट,
लेसु की रोटी, हरि साग तैयार था।
खटै हो या पिसी लूण
च्यूड़, भुटी भट्ट/ओमी
सदा बहार था।
छोटा सा गांव मेरा,
पूरा बिग बाजार था।
परात व कंटर बजा कर कत्यूर नचा देते थे,
बच्चा -बच्चा स्वरकण्ठी गीतकार था।
खरेटी खाव और खाड़ी खाव में नहा लेते थे,
साबुन और स्वीमिंग पूल सब बेकार था।
और फिर कबड्डी-गिरि-बालीबाल-क्रिकेट सब खेल लेते थे,
उस समय कहाँ आईपीएल का खुमार था।
आमा-बूबू से आणा-काथा सुन लेते थे,
कहाँ टेलीविजन और अख़बार था।
भाई-भाई को देखकर खुश था,
सभी लोगों में बहुत प्यार था।
छोटा -सा गांव मेरा,
पूरा बिग बाजार था।।

योगेश मेहरा, मौवे सोमेश्वर

Ad
Ad
Ad

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *