सुनो! मेरे आगन्तुक

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सुनो!मेरे आगन्तुक
मेरे लिए तुम्हारा आगमन
ऐसे ही है जैसे
ह्रदय की दरारों से
फूट पड़ा हो
भावों का एक झरना
चाहे भीषण ताप हो
या कंपकंपाता शिशिर
या मेघों की उदारता
से बढ़ता जलस्तर
वसंत ऋतु में सुमनों की
सुगंध से सुगंधित हो घाटी
या पतझड़ से नीरव होती धरती
समय और मौसम की मार से
अछूता ही रहेगा
मेरे साथ भी
और मेरे बाद भी
तुम्हारे लिए काव्य रूपी
भावों की ये निर्झरिणी
युगान्त तक बहती ही रहेगी


रश्मि पोखरियाल, कारगी , उत्तराखंड

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