कहानी: पौष की ठंड में अखबार वाला लडक़ा

AKHABAR WALA LARKA STORY
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पौष के माह में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। रात में पाला गिरने से सुबह धरती ऐसी लग रही थी, मानो आसमान से परी जमी पर उतर आई हो। पाले की वजह से सुबह जो ठंड से पूरा शरीर कपाकपा जाता था। इस कड़ाके की ठंड में एक लडका फटी-सी स्वेटर पहनकर सुबह-सुबह अखबार बांटने हमारे गांव की तरफ आता था। वह लगभग 10 किलोमीटर के दायरे में रोजाना 200 पेपर बांटता था। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण वह साईकिल से ही रोजाना आता था। मैं भी उससे रोज अखबार खरीदकर लाया करता था। रोज अखबार खरीदने से अब उससे जान पहचान हो गयी थी। कभी नकद तो कभी उधार, अखबार ले ही आता था। अखबार पढऩे की लत ऐसी थी, जैसे शराबी को शराब पीने की लत होती है। वैसे दारू तो स्वास्थ के लिए हानिकारक होती है। लेकिन अखबार पढऩा लाभदायक होने के साथ-साथ ज्ञानवर्धक भी होता है। हम इसी ज्ञान के लती थे। अत: ज्ञान को पाने के लिए हम सुबह उठकर अखबार वाले के पास अखबार खरीदने जाया करते थे। घर आकर में अंगीठी के सामने बैठकर अखबार की खबरों को बड़े मजे से पढ़ता था, पर कभी मंैने उस अखबार वाले लडक़े के बारे में नहीं सोचा था। जो इतनी ठंड में अखबार बांटता था। उस समय उम्र में वह लडक़ा मेरा बराबर था यानी करीब 10 या 12 साल का होगा। वह लडक़ा इतनी ठंड में अखबार बांटने क्यों आता था। ये मैंने कभी नहीं सोचा था। क्या इसके माता-पिता नहीं होगें, जो वह सुबह-सुबह इतनी ठंड में अखबार बांटने आता है। क्या वह भी घर जाकर अंगीठी के पास बैठकर आग सेकता होगा। ये सवाल मेरे अंदर उठते थे।

एक दिन वह लडका काफी देर तक अखबार लेकर नहीं आया, तो बहुत समय तक इंतेजार करने के बाद में बगैर अखबार लिये घर चला गया। अगले दिन जब मैं फिर अखबार लेने पहुंचा तो वह आज भी नहीं आया, मेरे मन कई सवाल पैदा हो गये, वह क्यों नहीं आया होगा। उसकी समस्या क्या होगी, वगैरह-वगैरह। इस तरह वह लडक़ा एक हफ्ते तक अखबार बांटने नहीं आया, दुकानदारों से पूछने पर पता चला कि उसके पिता की मृत्यु हो चुकी है। वह काफी गरीब परिवार से था। उसके पिता को कैंसर की बीमारी थी, जिस कारण वह लगभग एक साल से बिस्तरे पर ही पड़े थे। तब से वही लडक़ा अपना घर चलाता था। वह अखबार बांटने के साथ-साथ पढ़ाई भी करता था। अत: सुबह अखबार बांटने के बाद वह स्कूल चले जाता था। शाम को स्कूल से लौटने के बाद वह एक चाय की दुकान पर काम करता था। इस तरह काम करके वह अपने घर का खर्चा चलाता था। वह काम से छुट्टी होने के बाद घर जाकर पढ़ाई करता था, फिर सुबह तडक़े उठकर अखबार बांटने चले जाता था। यही उसकी दिनचर्या बन चुकी थी। दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वह भी पहाड़ के युवाओं की तरह फौज एवं पुलिस की तैयारी करने लगा। वैसे भी पहाड़ के युवाओं के पास फौज और पुलिस के अलावा तीसरा विकल्प ढूढना बड़ा मुश्किल है। क्योंकि वह पहले से लक्ष्य तैयार नहीं करते हैं कि हमें भविष्य में क्या करना है और कहां जाना है। अत: उसने भी पुलिस की तैयारी करनी शुरू कर दी। अब वह रोज सुबह 4 बजे उठकर दौडऩे को जाता था। पहाड़ों में कोई पार्क नहीं होने के कारण वह सडक़ पर ही दौड़ता था। अपने रोज की तैयारी करने के बाद अखबार बेचने जाता था।

पिता की मृत्यु होने के बाद घर की पूरी जिम्मेदारी उसी के सिर पर थी। अत: 12वीं तक कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वह पुलिस में भर्ती हो गया। यह उसके कई प्रयासों की मेहनत थी। यह उसके कड़े संघर्ष की मेहनत थी। जिससे वह आज पुलिस में सिपाही के पोस्ट पर तैनात था। उसकी मेहनत उसके लिए फलीभूत हुई थी। उसने गरीबी से संघर्ष करते हुए, सिर्फ और सिर्फ मेहनत की, जिस कारण वह आज अपनी मंजिल पर पहुंचा था।

लगभग वर्ष 2009 की बात थी, मुझे एक राष्ट्रीय अखबार में काम करने का मौका मिला था। अत: मैं नौकरी करने लगा। रोज सुबह 9 बजे ऑफिस जाना शाम को 6 बजे वापस कमरे पर आता था। बस यही थी अपनी दिनचर्या। दिसम्बर का महीना चल रहा था, ठंड ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया था। जिस कारण शाम होते ही ठिठुरन पैदा होने लगती। आज मुझे ऑफिस से लौटते हुए 8 बज गये थे। अधिक ठंड के कारण पूरे बाजार में सन्नाटा छा गया। मैं जिस ऑटो में बैठा था, उसमें लगभग 10 सवारियां ठुसी थी। अत: ऑटो वाला तेजी से चल रहा था। स्पीड इतनी मानो कोई पथा हवा के तेज झोके में उड़ रहा हो। अचानक तेज आवाज के साथ ऑटो रुक गया। आगे देखा तो ऑटो वाले ने सामने से आ रही एक गाड़ी पर ठोक दी। सामने गाड़ी से दो लोग बाहर उतरते हुए बोले, अबे दिखाई नहीं देता क्या? अंधा हो गया क्या? इस तरह उन दो व्यक्तियों से ऑटो वाले की तू-तू, मैं-मैं होने लगी। हम सभी सवारियां तमाशबीनों की तरह तमाशा देख रहे थे। जब मेरी नजर उस गाड़ी पर पड़ी तो पुलिस विभाग का बोर्ड लगा था। वह व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि वही अखबार वाला लडक़ा था, जो उस समय अखबार बांटता था। फिर में सोचने लगा एक शक्ल के कई होते है। फिर उसकी आवाज से मैंने आइडिया लगाया कि यह वही है। अब मैं पूरी तरह सही था कि यह वही लडका है। जो मुझे अखबार बेचता था। इस बीच उन दोनों की बहस और ज्यादा हो गई तो मुझसे रहा नहीं गया।

तो बीच मैं बोल पड़ा रवि जाने दो यार, तुम चुप हो जाओ। मेरे मुहं से अपना नाम सुनकर वह एकटक मुझे देखने लग गया। फिर बोला आप कौन है। मैंने कहां, याद हैं तुमसे मैं बचपन में अखबार खरीदता था। तो वह बोला हां-हां, याद आया, अच्छा तो आप वहां से है। फिर बोला आप यहां कैसे? तो मैंने कहा मैं यहीं एक अखबार में नौकरी करता हूॅ। फिर मैंने पूछा तुम? तो वह बोला मैं यहां की कोतवाली में हेड कांस्टेबल के पद पर तैनात हूॅ।

झगड़ा समाप्त होने के बाद रवि ने कहा कि भैया आप मेरे साथ चलिये। मैं रवि की गाड़ी में बैठ गया, फिर हम दोनों बतियाने लग गये। बातों-बातों में वह बोला कौन से अखबार में काम करते हो? मैंने जबाब दिया,जो अखबार में तुमसे बचपन में खरीदता था इत्तेफाक से उसी अखबार में नौकरी भी लग गयी। भगवान की कृपा से हम दोनों एक ही शहर में आ गये। आज अपनी मेहनत के दम पर हम दोनों बराबर थे। यहां ना कोई ग्राहक था ना कोई अखबार बांटने वाला हॉकर। आज हम दोनों समाज की सेवा कर रहे हैं। एक पुलिस में रहकर दूसरा मीडिया में रहकर।
यह कहानी हमें कड़ी मेहनत के बल पर हर पद को प्राप्त करने का जोश भरती है। इसलिए हमें कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं समझना चाहिए। यह अमीर-गरीब का फर्क नहीं देखती। यह सिर्फ कड़ी, मेहनत, लगन और निष्ठा देखती है। मेहनत, लगन और निष्ठा के बल पर आप कल किसी भी बड़े पद पर बैठ सकते हैं।

जीवन राज संपादक, पहाड़ प्रभात

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