घोड़ाखाल यात्रा: 150 रूपये में 5 किमी

ghorakhal temple
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नये साल के आगमन पर हर कोई नये संकल्प लेता है। कुछ नया करने की सोचता है। मैंने भी कई प्रण लिये और हर साल लेता हूूं। आधे पालन कर पाता हूं, आधे कल-कल करके साल गुजार देता हंू। हो सकता है, ऐसा आपके साथ भी होता है लेकिन यहां मैं अपनी बात कर रहा हूं। नये साल में पत्नी को घूमना और उसकी फरमाइश का खास ध्यान भी रखना होता है। नहीं तो रात को सूखी रोटियों से काम चल पड़ सकता है। ऐसे में हमारी श्रीमती के अनुसार इस बार सालगिरह पर हमने मंदिर जाने का प्लान बनाया। मैंने भी हां मैं हां मिला दी। साथ में ईजा-बौज्यू भी थे, तो मैंने सोचा ठीक ही कह रही है तो हमने घोड़ाखाल गोल्ज्यू मंदिर जाने का प्लान बनाया। बकायदा इसके लिए जनवरी से ही तैयारी शुरू कर दी। क्योंकि मार्च में हमारी सालगिरह थी, वो भी तीसरी। दिन कटते गये, दिन महीनों में बदल गये। जाते-जाते दो महीने बीत गये। फिर क्या था। पहली मार्च आ गया। 4 मार्च को अपनी सालगिरह थी। इसके लिए हमने 3 मार्च को एक बार अपनी शादी की कैसेट भी देख डाली। वीडियो देख अभी भी में अपने को कल का दूल्हा ही समझ रहा था लेकिन मैंने फिर पास में खेल रही अपनी बेटी को देखकर एक गहरी सांस भरते हुए मन ही मन कहा कि कल तो तीन साल पूरे हो जायेंगे।

अब घोड़ाखाल का प्लान था। सुबह 6 बजे ही उठकर नहाने-धोने की तैयारी शुरू हो गई। सुबह से ही सब्जी-पुरियां बनाकर पैकिंग शुरू कर दी। फिर तैयार होने के बाद हम लोग चल दिये घोड़ाखाल गोल्ज्यू के दर्शन को। केमू बस अड्डे पर पहुुंचे तो वहां बसों की लाइन लगी थी। जैसे अक्सर रोज लगते है। एक बस अल्मोड़ा-बागेश्वर जा रही थी। अत: हमने उससे पूछा भवाली तक ले जाओंगे क्या। उसने हां में सिर हिलाया। अक्सर दूर वाली बसें लोकल की सवारियां नहीं बैठाती है। यानी भवाली-भीमताल की। हां अगर रास्ते में कोई मिल जाय तो बैठा लेते है। बस वाला भी जान-पहचान का निकल गया और परिचालक भी। सीट भी मिल गई। ऐसे में करीब 9 बजे बस ने चलना शुरू किया। आज पहली बार परिवार के साथ घोड़ाखाल गोल्ज्यू के दर्शन करने का अलग ही आनंद मन ही मन आ रहा था। हालांकि इससे पहले भी मैं घोड़ाखाल गया था लेकिन तब अकेले ही एक झोला उठाकर चले थे। आज पूरे परिवार के साथ। बस में बैठे मुसाफिरों से बोलना-चालना शुरू हो गया। जैसे अक्सर होता है। बातों-बातों में कई लोग हमारे साइट के निकल गये। कई लोग ऐसे थे, जो होली के बाद ही पहाड़ से आने की बात कर रहे थे। वहीं बात-बात पर पहाड़ के पलायन पर भी जोर दे रहे थे। बगल पर बैठी एक बूढ़ी आमा बोल पड़ी। कब से तुम लोगों ने कच-कच लगा रखी है।

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bhawali  uttarakhand

पहले हम पैदल हल्द्वानी से पहाड़ चले जाते थे, आज बस से जा रही हूं। आज मेरे बहू-बेटे हल्द्वानी में रहते है। पर क्या करूं मेरा मन तो लगता ही नहीं। गाडिय़ों की आवाज, गर्मी अलग से, जैसा अपना पहाड़ ठैरा वैसा भाबर में कहा। हां पहाडिय़ों की तादात जरूर हल्द्वानी में बढ़ गई है। अब कोई पहाड़ नहीं जाना चाहता। पहले लोग दिल्ली-दिल्ली करते थे, आज हल्द्वानी-हल्द्वानी करने लगे। हमने तो अपनी जमीन भी किसी कमाने को दे दी। आधा वह ले लेते है, आधा हमें दे देता है। पहले तो मैंने कितनी नाली जमीन अकेले ही करी ठहरी। आज कहा होता ईजा अब…। आज की बहूएं कहा काम करती है, अपना ही श्रृंगार कर ले उतना ही बहुत है। दिन भर मोबाइल और टीवी जाने उनका। फिर आमा बोली पहले जब गाड़ी चली तो हम 10-15 रूपये में हल्द्वानी आते थे। आज 300 रूपये में कौसानी तक ही पहुंच रहे है। खैर आमा ने तो भवाली तक का रास्ता कटवा दिया हमारा। भवाली बाजार से एक मोड़़ पहले ही हम उतर गये। अब वहां से जाने के लिए जब टैक्सी वाले से बात की तो एक ऑल्टो कार वाला बोला, भाईसाहब 150 रूपये लूंगा। 30 रूपये सवारी। मैंने पूछा यहां से कितना किलोमीटर होगा घोड़ाखाल, तो बोला, करीब 5 किलोमीटर। मैं उसे देखता ही रहा। 5 किलोमीटर के 30 रूपये। बोला साहब अभी बढ़ा है किराया सब जगह का। अब मरता क्या नहीं करता, जाना तो था ही, इसलिए 150 रूपये देना ही उचित समझा। सभी लोग कार में बैठ गये। थोड़ी देर करीब 10 मिनट बाद पहुंच गये घोड़ाखाल मंदिर। ऐसा लगा 5 किलोमीटर था ही नहीं। शायद इससे कम ही है। खैर 150 रूपये तो गये, अब कुछ नहीं हो सकता, वैसे भी सालगिरह जैसे दिन मंदिर आये हैं क्यों मूड खराब करें, मैंने 150 रूपयों को जाने देना ही बेहतर समझा।

अब मंदिर जाने के लिए हमने पूजा की सामग्री लेनी थी। सामने ही एक दुकान पर गया तो पूजा की सामाग्री पूछी। वह बोला भाईसाहब थाली है 1०1 रूपये वाली। देखा तो एक नारियल, एक चुनरी, माता का श्रृंगार, खिचड़ी वही पहाड़ वाली मांस और चावल मिक्स वाली। बतासे, एक-दो फूल। बाकि न धूप न अगरबती। तो सभी ले रहे थे हमने भी ले ली। सीढिय़ों से मंदिर की ओर प्रवेश किया। रास्ते के दोनों ओर घंटियों की लंबी-लंबी लडिय़ा। छोटे से लेकर बड़ी से बड़ी घंटिया यहां देखने को मिल रही थी। मंदिर के दोनों ओर से रास्ता बनाया गया है। खैर मंदिर में पहुंचने के बाद थोड़ी देर लाइन में लगे। फिर पंडित जी ने पूजा-अर्चना कर प्रसाद दिया। इसके बाद हम लोग एक जगह धूप में बैठ गये। वहां बांज के पेड़ों की संख्या अधिक होने से ठंड बहुत थी। एक जगह बैठने के बाद हम लोगों ने कुछ फोटो-शोटो खींची।

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जैसे आजकल अक्सर होता है, बाजार से लेकर मंदिर तक। मॉल से लेकर सौली धार तक, लोग सेल्फी और फोटो लेने में जरा भी नहीं हिचकते। नहीं तो पहले के समय में शरम ही अधिक ठहरी। ऊपर से रील वाला कैमरा जिसमें 36 ही फोटो आने वाली ठहरी। लेकिन अब जमाना बदल गया। अब घड़ी से लेकर कैमरा, रेडियो, मनपंसद गीत सब हाथ में है। जब चाहे सुनों जब चाहे फोटो खींचो। समझ लो टैक्रालॉजी से जहां हम आगे बढ़े है, वहां बेरोजगारी भी बढ़ी है। पहले घड़ी बनाने वाली कंपनियां होती थी, लोगों को रोजगार मिलता था। रेडियो की अलग, कैमरे की अलग, टेपरिकॉडर की अलग। ऐसे में कई लोगों को रोजगार मिलता था। आज सबकुछ मोबाइल में है। खैर ज्यादा उपदेश देना भी ठीक नहीं। आगे बढ़ते है, यहीं हमने सब्जी-पूड़ी खाई। इसके बाद थोड़ा मंदिर में घूमे। चारों ओर का आनंद लिया। दूर-दूर तक पहाड़ों में बने मकान नजर आ रहे थे। नीचे की ओर देखने में भीमताल का सुंदर नजारा दिख रहा था। लगे हाथ हमने भीमताल की ओर पीठ कर एक-दो फोटो खींच लिये। थोडी़ देर इधर-उधर सुंदर पहाड़ों का नजारा देखने के बाद हम लोगों ने लौटने का निर्णय लिया। इसके बाद फिर एक टैक्सी वाले को150 रूपये दिये। भवाली तक पहुंचे। वहां से हल्द्वानी के लिए करीब 15 मिनट तक बस का इंतजार करते रहे लेकिन अभी तक कोई बस नहीं मिली।

इस बीच एक टैक्सी वाला हमारे पास करीब तीन बार आ चुका था। हल्द्वानी चल रहे हो-हल्द्वानी चल रहे हो। पहले उसने पांच सवारी के 500 रूपये बताये। थोड़ी देर में 80 रूपये सवारी में आ गया। बाद में मैंने 70 रूपये के हिसाब से पांच लोगों का टिकट फाइनल किया। सवारियों की ओवरलोडिंग का डर उसमें ना के बराबर था। ड्राइवर था बड़ा गजब का, तीन सवारी तो आगे हमने भी पहाड़ों में टैक्सी चालकों को बैठाते देखा था लेकिन उसने चार बैठा दिये और हम पांच लोग बीच वाली सीट पर। पीछे वाली सीट में 4 लोग और बैठे थे। कुल मिलाकर ओवरलोडिंग जबरदस्त थी। मैं सबकुछ देख रहा था। हालांकि कई लोगों ने कहा कि सवारी ओवरलोड है तो वह बोला क्या पड़ता है दाज्यू। तेल इतना महंगा है कि शाम तक गाड़ी, तेल का अपना खर्चा लगाकर दो पैसे बचने मुश्किल हो जाते है। कुछ सवारियां भीमताल की थी। इसलिए वह भीमताल की ओर से निकल रहा था। लगे हाथ में चार पहाड़ी नीबू ले लिये जो यहां 50 रूपये किलो बिक रहे थे। इसी नीबू को हम कभी 2 रूपये एक दाने के हिसाब से खरीदते थे। आज वही नीबू करीब 12.50 रूपये का पड़ गया। खैर इसके बाद टैक्सी चालक ने चलना शुरू किया। धीरे-धीरे आगे बढ़ते गये।

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भीमताल पहुंचने पर दो सवारियां उतर गई लेकिन कुछ आगे जाने के बाद एक सवारी और मिल गई। यानी ओवरलॉडिंग का टैक्सी चालक को कोई डर नहीं था। धीरे-धीरे टैक्सी हल्द्वानी की ओर निकल रही थी। भीमताल झील के किनारे-किनारे दौड़ रही थी। वाह कितना सुंदर था झील का दृश्य, एक पल के लिए ऐसा लग रहा था। यह दृश्य आंखों से ओझल न हो। लगे हाथ गाड़ी से ही एक-दो फोटो ले ली। काठगोदाम पहुंचने पर आगे की तीन सवारियां उतर गई। तब उसकी ओवरलॉडिग कम हुई। इसके बाद हम लोग हल्द्वानी पहुंचे। वहां से ऑटो पकड़ घर पहुंच गये। शाम को अपने शहरी होने का प्रमाण देते हुए सालगिरह का केक काटा। फिर खाना खाकर रोज की तरह सो गये। बस मना ली सालगिरह। 5 किलोमीटर के 150 रूपये किराये का मलाल मुझे आज भी है। कुल मिलाकर इस यात्रा में वाहन चालकों द्वारा नियमों का पालन न करना। जैसी सवारी मिले उससे वैसे पैसे लेना। किराये का फिक्स न होना। प्रशासन के नियमों को कागज तक ही सीमित रखा गया। हर दिन बनने वाले ये नियम धरातल पर अभी तक नहीं उतर पाये।

जीवन राज संपादक, पहाड़ प्रभात

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