कविता-हम शहर में रहते हैं…

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हम शहर में रहते हैं,
ऊँची ऊँची अट्टालिकाओं के मध्य,
बंद कमरों में चुपचाप।
अड़ोसी पड़ोसी भी नहीं झाँकता,
जिन्दा हैं या मर गए आप।
भीड़ का बनकर हिस्सा,
दौड़ रहे सपनों के पीछे,
भागम भाग मची गजब की,
बनकर रह गए भीड़ का किस्सा।

पशु पक्षी यदा कदा दिख जाते हैं,
दूर दूर तक वृक्ष नज़र नहीं आते हैं।
मोटर गाड़ियों की गड़गड़ाहट,
प्रदूषण भरी हवा की सनसनाहट।
कभी कभी डर जाते हैं सुन अपने ही कदमों की आहट।
कब सुबह से शाम होती है पता नहीं,
थककर चूर बिस्तर पर पड़ते हैं,
चाँदनी रात की सुंदरता पता नहीं।

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याद आती है ऐसे में मेरे गाँव की,
जहाँ दादी हैं, नानी हैं,
याद आती है उनकी ममता की छाँव की।
याद है अब भी वो पीपल के छाँव वाला चबूतरा,
जिसके नीचे बैठकर बुनते थे सपने,
सब कहते हैं अब भी वह वैसा ही है
हरा भरा।
बहुत भली थी मेहनतकश इंसानों की,
चूल्हे की रोटी,

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बहुत सुंदर थी मेरी दादी की,
लम्बी चोटी।
दूध की तरह सफ़ेद थे नानी दादी के बाल,
दरारें पड़ गईं थीं चेहरे पर
उम्र बता रही थी हाल।
हम बच्चे थे बहुत अच्छा लगता था उन्हें सताना,
भाता था नाना के कंधे पर बैठ अपना ठाठ जमाना।
याद आती है ओ गाँव की हरियाली,
याद आती है सुबह की धूप,
शाम ढलने पर सूरज की लाली।
याद है खाट पर पड़ा बिछउना,
जिसपर लिटाकर माँ सिर पर हाथ फेरती कहती बिटिया देख चाँद खिलौना।
याद है अब भी बारिश का पानी,
खिलता था इंद्रधनुष,
फिर खिलती थी धूप सुहानी।
अब सिर्फ यादें ही हैं पास,
ये यादें हैं बहुत बहुत खास।
पास रखा है अलबम जैसे साथी,
वही है अब जीवन की झाँकी।।
डॉ संज्ञा प्रगाथ

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पहाड़ प्रभात डैस्क

संपादक - जीवन राज ईमेल - [email protected]

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