हल्द्वानी: अलविदा दीवान कनवाल, हंसनी किले ना, दाज्यू मेरी घरवाली रिसेगे…

(जीवन राज)- Haldwani News:उत्तराखंड के लोकप्रिय लोकगायक दीवान सिंह कनवाल के निधन से पहाड़ के संगीत जगत में गहरी शोक की लहर दौड़ गई है। उनके जाने से लोकसंगीत की वह मधुर आवाज खामोश हो गई, जिसने दशकों तक पहाड़ के लोगों के दिलों में अपनी खास जगह बनाई। सच मायनों में कहा जाए तो उत्तराखंड के संगीत जगत में उनकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी।
बचपन से ही पहाड़ी संगीत के प्रति मेरा गहरा लगाव रहा है। आज उनके निधन की खबर सुनते ही बचपन की कई यादें ताजा हो गईं। वह दौर टेप रिकॉर्डर का था, जब घर-घर में उनके गीत गूंजते थे। उनका सुपरहिट कुमाऊंनी गीत हसनी किले ना दाज्यू, मेरी घरवाली रिसेगे… बच्चे से लेकर बुजुर्गों तक हर किसी की जुबान पर रहता था। यह गीत केवल एक धुन नहीं, बल्कि पहाड़ की खुशबू और अपनापन अपने साथ लेकर आता था।
हाल ही में आया उनका गीत सलाम चौकीदारा भी उत्तराखंड के संगीत जगत में खूब सराहा गया। खास बात यह रही कि नई पीढ़ी ने भी इस गीत को खूब गुनगुनाया और एक बार फिर महसूस किया कि दीवान कनवाल जैसे लोकगायक हमारी संस्कृति और लोकधरोहर को संजोने का कितना बड़ा काम करते रहे हैं।
करीब 36 वर्षों तक उत्तराखंड के संगीत जगत से जुड़े दीवान सिंह कनवाल ने 100 से अधिक कुमाऊंनी गीत गाए। उनके गीत आज भी पहाड़ों में उतने ही पसंद किए जाते हैं, जितने पहले थे। उनकी आवाज में वह अपनापन था, जो सीधे दिल तक पहुंच जाता था।
संगीत के साथ-साथ उनका जुड़ाव सांस्कृतिक मंचों से भी रहा। उन्होंने अल्मोड़ा के लक्ष्मी भंडार हुक्का क्लब से रामलीला में मंदोदरी का पाठ कर अपने अभिनय की शुरुआत की थी। इसके बाद वह लंबे समय तक अल्मोड़ा और आसपास होने वाले सांस्कृतिक आयोजनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते रहे।
आज भले ही दीवान सिंह कनवाल हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके गीत हमेशा पहाड़ की वादियों में गूंजते रहेंगे। जब-जब कोई उनके गीत गुनगुनाएगा, तब-तब उनकी यादें भी ताजा हो जाएंगी। उनकी मधुर आवाज और लोकसंगीत के प्रति उनका समर्पण उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत में हमेशा अमर रहेगा।















